Back in 2019, I wrote this poem when I strongly fought with my own self between leaving and continuing into a relationship that was not peaceful.
तोड़ दो रिश्ते कि बंधन ओर निकल जाओ
तोड़ दो दिल की जंजीर और निकल जाओ
यहां तुम्हारा कोई नहीं
यहां तुम्हारा घर नहीं
कोही तुम्हारा अपना नहीं
कोही तुम्हे चाहता नहीं
बचा कोही सपना नहीं
ये तुम्हारा संसार नहीं
निकल जाओ
निकल जाओ
तोड़ के सारे बंधन तुम निकल जाओ
छोड़ के सारे रिश्ते निकल जाओ
तोड़ दो रिश्ते कि बंधन ओर निकल जाओ
तोड़ दो दिल की जंजीर और निकल जाओ
अपना रास्ता ख़ुद बना लो
इन आंखों में सपने सजा लो
आंसू को अब छुट्टी दिला दो
खुशियों को दिल में बुला लो
जीने का अंदाजा बदल दो
जीवन की रफ़्तार बदल लो
निकल जाओ
तोड़ के सारे बंधन तुम निकल जाओ
छोड़ के सारे रिश्ते निकल जाओ
तोड़ दो रिश्ते कि बंधन ओर निकल जाओ
तोड़ दो दिल की जंजीर और निकल जाओ
